Tanhaji Malusare Biography असल में कौन है तानाजी मालूसरे

Tanhaji Malusare Biography

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Real Story –

भारत  देश के इतिहास में बहुत से वीर योद्धाओं ने जन्म लिया। उनकी शूरवीरता की कहानी आज दुनिया भर में प्रसिद्ध है, जिन्होंने न केवल देश की रक्षा की बल्कि देश के लिए बहादुरी से हंसते हंसते अपनी जान की आहुति भी दे दी।

आज ऐसे ही एक वीर योद्धा के बारे में हम आपको बताएंगे जिसकी साहस और शौर्य की मिसाल आज भी कायम है। इतिहास के पन्नों में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। इस वीर योद्धा का नाम है तानाजी मालूसारे .

हाल ही में अजय देवगन की फिल्म आई है जो इनके जीवन पर आधारित दर्शाई गई है। तानाजी मालुसारे का नाम कुछ लोगों द्वारा जाना माना हो सकता है लेकिन आज भी भारत के अधिकतर लोग तानाजी के साहस पराक्रम और बहादुरी से परिचित नहीं है। 

Tanhaji Malusare Biography

 

तानाजी मालुसारे का परिचय ( Tanhaji Malusare Biography )

तानाजी मालुसारे का जन्म 16 वीं शताब्दी में महाराष्ट्र के कोकण नामक प्रांत में हुआ था। वह एक हिंदू कोली परिवार में पैदा हुए थे। तानाजी को बचपन से ही तलवार से खेलने का शौक था और इसी शौक बाजी के कारण उनकी मित्रता छत्रपति शिवाजी से हुई। तानाजी शिवाजी के सबसे घनिष्ठ मित्र थे। आगे चलकर छत्रपति शिवाजी ने तानाजी को अपनी सेना का सेनापति और मराठा साम्राज्य का मुख्य सूबेदार घोषित कर दिया था। 

छत्रपति शिवाजी और तानाजी मालुसारे साहसी एवं बहादुर होने के साथ-साथ चालाक और सूझबूझ से भरे योद्धा थे। इतिहास गवाह है कि साहसी और बहादुरी के कारण ही शिवाजी ने मुगल साम्राज्य और औरंगजेब को धूल चटा कर मराठा साम्राज्य की स्थापना किया। इस सारी युद्ध में तानाजी मालुसारे का भी विशेष योगदान रहा। 

जून 1665 ईसवी में पुरंदर समझौते के अनुसार शिवाजी को कोंधाणा समेत 23 जिलों को मुगलों के हाथे सौंपना पड़ा था जिससे की मराठा साम्राज्य के अभिमान को ठेस पहुंच गया था। 

इस समझौते से छत्रपति शिवाजी की माता जीजाबाई को बहुत कड़ा ठेस पहुंचा था। माता जीजाबाई को कोंधाणा पर दुबारा अपना अधिपत्य जमाना था। शिवाजी महाराज अपनी माता जी की हुकुम सरांखो पर रखते थे। लेकिन कोंधाणा पर अधिकार करना असंभव था। कोंधाणा की रक्षा 5000 मुगल सैनिक कर रहे थे।

लेकिन माता जीजाबाई की इच्छा प्रबल थी। उन्हें कोंधाणा हर हाल में चाहिए था। शिवाजी महाराज ने माता जीजाबाई को बहुत समझाया कि कोंधाणा को जीतने बहुत से योद्धा गए पर आज तक लौटकर कोई नहीं आया। लेकिन माता जीजाबाई की दुखी हो जाने के डर से उन्होंने कोंधाणा पर विजय हासिल करने के लिए एक ऐसे व्यक्ति को यह जिम्मेदारी सौंपना उचित समझा जोकि असंभव को संभव करने वाला व्यक्ति था। 

तानाजी मालुसारे की साहस (Tanhaji Malusare Courage )

वह व्यक्ति थे तानाजी मालूसारे। शिवाजी इस कार्य को अंजाम देने के लिए तानाजी के अलावा किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। शिवाजी का संदेशा मिलने के बाद तानाजी अपने पुत्र के विवाह का जश्न छोड़ तुरंत अपने छोटे भाई व मामा सैलार के साथ शिवाजी महाराज से मिलने निकल गए। अपने परम मित्र तानाजी मालुसारे से मिलने के बाद शिवाजी महाराज जिस कार्य के लिए उन्हें याद किया है, उस बात को बताने का साहस शिवाजी में नहीं था। इसलिए उन्होंने उस कार्य के बारे में जानने के लिए माता जीजाबाई के पास भेजा था।

माता जीजाबाई से कोंधाणा पाने की इच्छा सुने तो उस युद्ध की भयानक परिणाम का परवाह न करते हुए शेर दिल तानाजी मरने और मारने की प्रतिज्ञा ठान ली और चुनौती स्वीकारते हुए बोले मैं जीत कर लूंगा कोंडाणा किला, आपके लिए। 

कोंधाणा किले पर वॉर 

फरवरी 1670 में सर्दी के अंधेरी रात में कुछ 1000 मराठा सैनिकों के साथ तानाजी ने रात में ही युद्ध आरंभ कर दिया। किला चारों तरफ पहाड़ों से घिरा हुआ था, तानाजी ने रस्सी के माध्यम से सैनिकों के साथ किला पर चढ़ने का प्रयास किया। और कुछ हद तक सफल हुए। तानाजी के साथ करीब 300 सैनिक ही किले पर चढ़े थे की वहां पर तैनात मुगलों सेना को इस बात की भनक लग गई और युद्ध मुहिम जारी हो गया।

जबकि 700 मराठा सैनिक अभी भी पहाड़ के नीचे ही थे। तानाजी के सामने बहुत ही गंभीर समस्या पैदा हो गई लेकिन तानाजी ने अपने 300 सैनिकों के साथ ही मुगलों सेना के नाक में दम कर दिया। इतिहासकार बताते हैं कि युद्ध काफी भयंकर हुआ था। एक-एक योद्धा सौ-सौ लोगों के शौर्य के बराबर था। युद्ध प्रारंभ हो गई थी और तानाजी के कई सारे सैनिक मारे जा चुके थे। थोड़ी देर में मुगलों का सरदार उदय भान का सामना तानाजी के साथ हुआ।

इधर भयानक सर्दी की अंधेरी रात में मराठा सैनिकों को काफी दिक्कतें आ रही थी अकेले तानाजी लंबी लड़ाई लड़ने के बाद बुरी तरह थक चुके थे और घायल भी हो चुके थे। जिसके परिणाम स्वरूप एक लंबी वीरता भरी लड़ाई लड़ने के बाद तानाजी इस युद्ध में शहीद हो गए। तानाजी के शहीद होने की खबर सुनकर मराठा सैनिकों के पैरों तले जमीन खिसक गई। एसिड सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल 

लेकिन तानाजी ने अकेले ही युद्ध को जारी रखा था जिससे कि नीचे खड़े 700 सैनिक पहरा तोड़कर किले के अंदर घुसने में सफल हो चुके थे। अंत में मुगलों के सरदार उदय भान को भी मौत के घाट उतार दिया गया। जिसके कारण किले की सुरक्षा तहस-नहस हो गई और महल के सिपाही स्वयं को बचाने के प्रयास में किले से कूद गए और कुछ मारे गए। मराठों को बहुत बड़ी विजय प्राप्त हुई लेकिन उनके समूहों में खुशी थोड़ी भी नहीं थी।

इस जीत का समाचार महाराज शिवाजी को दिया गया जो तानाजी का अभिनंदन करने तुरंत किले की ओर निकल दिये किंतु बड़े दुख के साथ उस सुरवीर का मृत्यु शरीर देखने को मिला, जोकि युद्ध में शहीद हो चुके थे। इतिहासकारों के अनुसार शिवाजी महाराज तानाजी के मृत्यु के कारण लगातार 12 दिन तक रोते रहे। साथ ही जीजाबाई भी बहुत दुखी रहीं। कोंधाणा जीतने के बाद भी शिवाजी खुश नहीं थे।

तानाजी मालुसारे की यादें ( Tanhaji Malusare Memories )

उन्होंने कहा – “गढ़ तो जीत गए लेकिन मेरा शेर इसमें शहीद हो गया” और अपने उस शूरवीर की याद में उस किले का नाम कोंधाणा किला बदलकर सिंघगढ़ रख दिया। इसके अलावा भी महाराष्ट्र में कई जगह ताना जी के स्मारक वीरता के रूप में स्थापना की गई थी। 3 अगस्त 1984 को भारत के किले के शीर्षक से निकले 4 विशेष डाक टिकटों में 150 पैसों वाला डाक टिकट सिंघगढ़ को भी समर्पित है।

19 जुलाई 2017 को बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता अजय देवगन ने तानाजी मालुसारे पर आधारित एक फिल्म Tanhaji: The Unsung Warrior  फिल्म बनाने की घोषणा की जिसके निर्देशन उमरावत द्वारा किया जा रहा है। जिसमें मुख्य किरदार अजय देवगन काजोल और सैफ अली खान द्वारा दर्शाया गया है। इसके पहले साल 1933 में आया मराठी फिल्म सिंहगढ़ में भी ताना जी की जीवनी को दिखाया गया है। जिस फिल्म का निर्देशन उस समय के मशहूर निर्देशक वी शांताराम ने किया था। 

 

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