लाचार बूढ़ी दादी Short Moral Stories In Hindi

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Short Moral Stories In Hindi – सोहना  नाम के गांव में एक बूढ़ी दादी रहती थी। वह काफी बुजुर्ग हो गई थी। दादी की लालसा केवल जिह्वा की स्वाद के लिए कुछ खाने की थी। इसके अलावा वे  दूसरों को देखकर अपने दुख को बयां ना कर पाने के कारण केवल रोती रहती थी। उनके शरीर के अंगों ने जवाब दे दिया था। दूसरों के द्वारा बाजार से खाई जाने वाली सामान लाने पर वह मांगने के अलावा उन्हें देखकर केवल रोती रहती थी।

वह चिल्ला चिल्ला कर रोती  थी। उनका रोना साधारण नहीं था। दादी के पतिदेव का स्वर्गवास हुए विगत वर्ष बीत चुका था। और उनके दो पुत्र थे। जोकि युवा अवस्था में ही स्वर्गवास को सिधार चुके थे। बूढ़ी दादी का केवल एक भतीजा था। जिसका नाम धनीराम था। और उसी भतीजे के नाम बूढ़ी दादी ने अपनी सारी संपत्ति लिख दी थी। 

भतीजे धनीराम ने दादी की संपत्ति अपने नाम लिखवाते समय खूब लंबी चौड़ी बातें की। किंतु यह सब बातें केवल कुछ समय के लिए दिखावा था। बूढ़ी दादी को पेट भर भोजन भी मिलना दुश्वार था। और इसमें उनके भतीजे धनीराम वह उसके अर्धांगिनी का हाथ था। 

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धनीराम की पत्नी का नाम रूपा था। रूपा स्वभाव से तीखी स्वभाव की थी,लेकिन ईश्वर से डरती थी। धनीराम स्वभाव से सज्जन था।  लेकिन तभी तक जब तक उसके ऊपर कोई आंच ना आए। यदि द्वार पर बूढ़ी दादी के पास कोई व्यक्ति बैठा होता और बूढ़ी दादी उनसे अपनी व्यथा सुनाती तो धनीराम उन पर आग बबूला हो जाता और बूढ़ी दादी को जोर जोर से डाँटता था।

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 माता-पिता का बर्ताव देख धनीराम के दो पुत्र भी बूढ़ी दादी को सताया करते थे। यदि पूरे परिवार में बूढ़ी दादी की किसी से लगाव था तो वह धनीराम के सबसे छोटी बेटी मधुरिमा थी। जिसकी उम्र मात्र 4 वर्ष थी।

एक दिन की बात है, धनी राम के बड़े बेटे की तिलक आई थी, घर के दरवाजे पर शहनाई बज रहे थे। घर पर अधिक सारे मेहमान आए हुए थे। घर के अंदर पड़ोस की सारी औरतें भी आई हुई थी। उस दिन कई सारे पकवान तैयार किए जा रहे थे। हलवाई अच्छी-अच्छी मिठाईयां बना रहे थे। किसी कढ़ाई में गरमा- गरम पूरी, पकोड़े और अच्छी-अच्छी सब्जियां बनाई जा रही थी।

बूढ़ी दादी बेचारी अपने छोटे से कमरे में अकेली बैठी पड़ी थी। और इन सब स्वादिष्ट पकवानों की महक बूढ़ी दादी के नाक तक जा रहे थे। बूढ़ी दादी को सालों बाद इस तरह के स्वादिष्ट खाना खाने की उम्मीद जगी थी। कुछ समय बीतने के बाद बूढ़ी दादी ने सोचा कि, क्या हुआ खाने में इतना देर क्यों लग रहा है ? अभी तक मुझे कोई पूछने या खाना देने नहीं आया। मधुरिमा भी नहीं आई। कहीं सभी लोग भोजन कर घर तो नहीं चले गए। ऐसा ना हो कि खाना हमें ना मिले, और खाना खत्म हो जाए।  इस प्रकार की बातें बुड्ढी दादी के ख्याल में आ रही थी।

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बूढ़ी दादी ने सोचा चलो थोड़ा बाहर ही चल कर जहां खाना बन रहा है, वहीं बैठते हैं। बूढी दादी दोनों हाथों के बल घीसकते हुए  हुए हलवाई के पास जाकर बैठ गई।  इतने में रूपा ने उनको देख लिया। रूपा अपने तीव्र स्वभाव के कारण क्रोध में आ गई। और बूढ़ी दादी को दोनों हाथों से झपटने लगी। और बोली अभी भगवान को भोग ना लगा, हमारे मेहमानों ने खाना नहीं खाया और तुम बुढ़िया पहले ही आकर पकवान के पास मुंह की पानी टपकाने लगी। और इतना कह कर वहां से बूढ़ी दादी को भगा दिया।

बूढ़ी दादी वापस अपने कमरे में आकर बैठ गई। वह अपशगुन के भय से रो भी नहीं रही थी। और मन ही मन सोच रही थी कि, रूपा ने सही ही तो बोला है ! अभी भगवान को भी भोग ना लगा, मेहमानों ने भी खाना नहीं  खाया। और मैं पहले बेचैन हो गई थी। और यह सोच कर खाने की बुलावे को लेकर प्रतीक्षा करने लगी। लेकिन कोई बुलावा नहीं आया। सफलता से कुछ कदम पहले

 सभी मेहमान भोजन कर वापस अपने -अपने घर जा चुके थे। धनीराम का परिवार भी भोजन कर सो चुका था। और इधर बूढ़ी मां भूख से व्याकुल हो खाने की प्रतीक्षा कर रही थी। धनीराम की बेटी मधुरिमा अच्छे स्वभाव की थी। वह बूढी दादी से बहुत प्यार करती थी। लेकिन अपनी माँ की भय के कारण दादी माँ के लिए कुछ खाने को नहीं ले जा पा रही थी।

सबके सो जाने के बाद मधुरिमा अपने हिस्से की पूरी बचाकर बूढ़ी दादी के पास ले गई। बूढ़ी दादी ने मधुरिमा से पूछा ! क्या यह पूरी तुम्हारे अम्मा ने दिया है।  मधुरिमा बोली नहीं। मैं यह अपने हिस्से की लाई हूं। यह सुन बूढ़ी मां की आंखों में आंसू आ गए। लेकिन भूख अधिक होने के कारण सारी पुड़िया खा गई। फिर भी पेट ना भरा। क्योंकि मधुरिमा 5 साल की छोटी बच्ची थी। और वह दो से तीन पूरी ही ले गई थी।

भूख से बेचैन हो बूढी दादी ने मधुरिमा से कहा – बेटी मेरा हाथ पकड़ बाहर ले चलो। जहां मेहमानो ने खाना खाया है। प्यारी मधुरिमा दादी को बातो को ना समझ सकी और हाथ पकड़ बाहर ले गयी। दादी माँ ने बाहर जाते ही मेहमानों के फेके गए झूठे पत्तलों  के पास जाकर बचे हुए खाना खाने लगीं। तभी रूपा की आंखें खुली और मधुरिमा को खोजते हुए बाहर आई।

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बाहर का यह नजारा देख ! मधुरिमा पास में खड़ी थी और बूढ़ी दादी मेहमानों के फेके गए  झूठे पत्तलों का बचा खाना खा रहीं थी। यह सब नजारा देख रूपा का हृदय पिघल गया। और उसे बूढी दादी पर बहुत ही दया आया। और उसने कहा – जिस बूढ़ी दादी की संपत्ति को लेकर मैं राज कर रही हूं। उस बूढ़ी दादी को भला इतना कष्ट कैसे दे सकती हूं। जिस आन बान के लिए मैं इतना खर्चा पड़ोसियों और  मेहमानों पर कर रही हूं, वह किस काम का। जब मेरे ही अपने बूढ़ी दादी भूख से बेचैन तड़प रही हो।

और तुरंत रूपा ने अपने भंडार गृह में प्रवेश किया। और सभी पकवानों से एक थाली सजाई और बूढ़ी दादी के पास गई। जिस प्रकार छोटा बच्चा मिठाई को देख सारे शिकवा शिकायत भूल मिठाई पर टूट जाता है। ठीक उसी प्रकार बूढ़ी दादी सारी बातों को भूल खाने में लग गई। रूपा को अपने किये पर पछतावा आ रहा था। रूपा ने बूढ़ी दादी से क्षमा याचना मांगी। अब बूढी दादी को रूपा अपने माँ के सामान मानने लगी थी। 

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